समाज में एक दूसरे के हाथ खींचे, टांग नहीं


(कवि दशरथ प्रजापत, पथमेड़ा, जालोर, राजस्थान)


देश के बहुतायत समाज में देखा जाता है कि समाज को आगे बढ़ाने वाले व्यक्ति की ही टांग खींच ली जाती है उसका समर्थन तो कोसों दूर बल्कि यदि वह अपने समाज को सही दिशा दे रहा है तब भी उसके खिलाफ लोग आ जाते हैं ये प्रत्येक समाज के लिए दुविधा की बात है क्योंकि समाज को आगे बढ़ाने के लिए एकता जरूरी है और यदि समाज आगे बढ़ेगा तो देश का आगे बढ़ना स्वाभाविक है।


विशालतम देश में अनेक समाज ऐसे हैं जिनका राजनीतिक स्तर पर कोई सुनने वाला नहीं है अर्थात्‌ उस समाज से राजनीति में कोई व्यक्ति विशेष नहीं है जिस कारण उस समाज के बहुत सारे मुद्दे अथवा समस्याओं का समाधान नहीं हो पा रहा है, देश में प्रत्येक समाज की जनसंख्या के आधार पर राजनीति में सक्रिय भागीदारी होनी चाहिए ताकि उस समाज के लोगों की आवाज केंद्र तक पहुंच सके।


विडंबना की बात यह है कि बहुत लोग अपने समाज के हित की सोचते हैं लेकिन स्वार्थी लोग लालच में आकर अथवा द्वेष की ज्वाला में उन लोगों को राजनीति में कदम नहीं रखने देते हैं ये लोग खुद के पाँव पर कुल्हाड़ी मारने का कार्य करते हैं, यहाँ एक बात और दृष्टिगोचर होती है बहुत व्यक्ति अपने समाज के दम से राजनीति में जाते हैं फिर समाज को ही भूल जाते हैं ऐसे अयोग्य लोगों को समाज के शिखर पर नहीं रखना चाहिए, यथार्थ में समाज ही देश को सबकुछ देता है क्योंकि समाज से समाज को मिलाकर ही राष्ट्र का निर्माण होता है।